तुझे ज़रा दुख और सिसकने वाला मैं
तिरी उदासी देख न सकने वाला मैं
तिरे बदन में चिंगारी सी क्या शय है
अक्स ज़रा सा और चमकने वाला मैं
तिरे लहू में बेदारी सी क्या शय है
लम्स ज़रा सा और महकने वाला मैं
तिरी अदा में पुरकारी सी क्या शय है
बात ज़रा सी और झिजकने वाला मैं
रंगों का इक बाग़-ए-हसीं चेहरा तेरा
क्या क्या देखूँ आँख झपकने वाला मैं
संग नहीं हूँ बात न मानूँ मौसम की
हुआ ज़रा सी और लचकने वाला मैं
सफ़र में तन्हा क़दम उठाना मुश्किल है
साथ तुम्हारे कभी न थकने वाला मैं
ग़ज़ल
तुझे ज़रा दुख और सिसकने वाला मैं
राजेन्द्र मनचंदा बानी

