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तुझे पा के तुझ से जुदा हो गए हम | शाही शायरी
tujhe pa ke tujhse juda ho gae hum

ग़ज़ल

तुझे पा के तुझ से जुदा हो गए हम

सिराज लखनवी

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तुझे पा के तुझ से जुदा हो गए हम
कहाँ खो दिया तू ने क्या हो गए हम

मोहब्बत में इक सानेहा हो गए हम
अभी थे अभी जाने क्या हो गए हम

मोहब्बत तो ख़ुद हुस्न है हुस्न कैसा
ये किस वहम में मुब्तला हो गए हम

ये क्या कर दिया इन्क़िलाब-ए-मोहब्बत
ज़रा आईना ला ये क्या हो गए हम

हक़ीक़त में बंदा भी बनना न आया
समझते हैं दिल में ख़ुदा हो गए हम

क़यामत था तुझ से निगाहों का मिलना
ज़माने से ना-आश्ना हो गए हम

न रास आईं आख़िर हमें ठंडी साँसें
अजब साज़ थे बे-सदा हो गए हम

तसव्वुर में बल पड़ गए अब्रूओं पर
ये किस बेवफ़ा से ख़फ़ा हो गए हम

गुदाज़-ए-मोहब्बत हमें दिल बना दे
बस एक आँच और आबला हो गए हम

कभी बज़्म-ए-हस्ती की रौनक़ हमीं थे
'सिराज' अब बुझा सा दिया हो गए हम