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तुझ क़द की अदा सर्व-ए-गुलिस्ताँ सीं कहूँगा | शाही शायरी
tujh qad ki ada sarw-e-gulistan sin kahunga

ग़ज़ल

तुझ क़द की अदा सर्व-ए-गुलिस्ताँ सीं कहूँगा

अब्दुल वहाब यकरू

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तुझ क़द की अदा सर्व-ए-गुलिस्ताँ सीं कहूँगा
जादू-ए-नयन नर्गिस-ए-बुस्ताँ सीं कहूँगा

देखा हूँ तिरे लब पे मैं मिस्सी की धड़ी कूँ
ज़ुल्मात पे जा चश्मा-ए-हैवाँ सीं कहूँगा

मुझ दिल की लगन तुझ सीं है ऐ ख़ूबी-ए-महफ़िल
परवाना नमन शम-ए-शबिस्ताँ सीं कहूँगा

पैदा किया तुझ शौक़ में दिल वुसअत-ए-मशरब
यूँ हालत-ए-दिल कोह-ओ-बयाबाँ सीं कहूँगा

देखा हूँ तुझे ख़्वाब मुनीं ऐ परी-पैकर
इस ख़्वाब के तईं जा के सुलैमाँ सीं कहूँगा

ख़ंजर सीं नयन के दिल-ए-'यकरू' हुआ ज़ख़्मी
अब दिल की तपिश ख़ाक-ए-शहीदाँ सीं कहूँगा