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तो मिल भी जाए तो फिर भी तुझे तलाश करूँ | शाही शायरी
to mil bhi jae to phir bhi tujhe talash karun

ग़ज़ल

तो मिल भी जाए तो फिर भी तुझे तलाश करूँ

रूही कंजाही

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तो मिल भी जाए तो फिर भी तुझे तलाश करूँ
हर एक दौर में तख़्लीक़-ए-इर्तिआश करूँ

मैं फ़ाश हो ही चुका हूँ तो क्या ज़रूरी है?
कि अपने साथ तुझे भी जहाँ में फ़ाश करूँ

सुराग़-ए-ज़ीस्त मिले रेज़ा रेज़ा इंसाँ को
बुतान-ए-अस्र को कुछ ऐसे पाश पाश करूँ

ज़मीं ने क़र्ज़ दिया मुझ को रिज़्क़ की सूरत
मरूँ तो क्यूँ न सुपुर्द उस के अपनी लाश करूँ

मुझे नजात मिले तीरा-कारियों से काश
मैं नूर उगाऊँ यहाँ रौशनी मआश करूँ

मिरी बक़ा का तक़ाज़ा है जब भी रुत बदले
मैं जम्अ अज़-सर-ए-नौ अपनी क़ाश क़ाश करूँ

जदीद दौर में रहते हुए भी ऐ 'रूही'
है आरज़ू कि न तर्क अपनी बूद-ओ-बाश करूँ