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तिरी तेग़ अबरू की टुक सामने कर देखें तो | शाही शायरी
teri tegh abru ki Tuk samne kar dekhen to

ग़ज़ल

तिरी तेग़ अबरू की टुक सामने कर देखें तो

मिर्ज़ा अज़फ़री

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तिरी तेग़ अबरू की टुक सामने कर देखें तो
बच्चे ख़ुर्शीद भी रख मुँह पे सिपर देखें तो

मेरे ख़ुर्शीद-लक़ा दीद की टुक रुख़्सत दे
तेरे दीदार को फिर एक नज़र देखें तो

तेग़ तोले हुए काँधे पे जो आया है सवार
ओ सजीले मिरे घोड़े से उतर देखें तो

मर गया जो उसे कहते हैं हुआ आज विसाल
जी रचा ज़ीस्त से इस हिज्र में मर देखें तो

बह चुका ख़ाना-ए-दिल आँख तक आ पहुँची सैल
रोए जा और भी ऐ दीदा-ए-तर देखें तो

आ के आँखों का शबिस्ताँ मिरा रौशन कर दे
वो दिन आता है कब ऐ नूर-ए-बसर देखें तो

है मसल ग़ुस्सा उतर जाता है पाँव पे गिरे
क़दमों पर उस के भला सर को भी धर देखें तो

दिन बहुत बीत गए गलियाँ हैं सूनी तुझ बिन
जानी बन-ठन ज़री आ जाओ इधर देखें तो

सब कहें गुज़री प गुज़री न कु-ए-दिल-बर में
रहे जाँ 'अज़फ़री' इस से भी गुज़र देखें तो