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तिरी तहारत को शैख़ कह तू कहाँ से लाएँ इक आब-ए-जू हम | शाही शायरी
teri tahaarat ko shaiKH kah tu kahan se laen ek aab-e-ju hum

ग़ज़ल

तिरी तहारत को शैख़ कह तू कहाँ से लाएँ इक आब-ए-जू हम

जोशिश अज़ीमाबादी

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तिरी तहारत को शैख़ कह तू कहाँ से लाएँ इक आब-ए-जू हम
तवाफ़-ए-दिल का है क़स्द हम को करें हैं आँसू से नित वज़ू हम

ब-तंग आए हैं ज़िंदगी से रहेंगे ख़ौफ़-ए-फ़ना में कब तक
जो होनी हो सो शिताब होवे खड़े हैं क़ातिल के रू-ब-रू हम

रखे तू जब तक जहाँ में या-रब तिरे करम से उमीद ये है
रहे न मुतलक़ तलाश-ए-दाैलत करें न दुनिया की जुस्तुजू हम

ख़िज़ाँ ने सब की बहार खो दी रहा न सुम्बुल बची न रैहाँ
गुलों को देखा हुए परेशाँ चमन से निकले ब-रंग-ए-बू हम

ग़म-ओ-अलम ने तो कर रखा है हमारे चेहरे को ज़र्द 'जोशिश'
लहू के आँसू अगर न रोएँ न हों मोहब्बत में सुर्ख़-रू हम