तिरे शहर-ए-अम्न का क्या कहें कि हर इक मकान जुदा सा है
हैं दरों पे क़ुफ़्ल लगे हुए सर-ए-ताक़ दीप बुझा सा है
तिरा दश्त भी तो है बे-कराँ मिरी वहशतों की भी हद नहीं
मिरे जुर्म-ए-ख़ाना-ख़राब को तो ये रहगुज़र भी दिलासा है
तिरी याद आई तो किस तरह मैं पुकारता ही चला गया
कोई दम रुका तो ख़बर हुई कि ये कोह कोह-ए-निदा सा है
मिरी ग़ैरत-ए-हमा-गीर ने मुझे तेरे दर से उठा दिया
कुछ अना का ज़ोर जो कम हुआ तो ख़बर हुई तू ख़ुदा सा है
अभी ला की मंज़िल-ए-सख़्त में हूँ फ़रेब-ओ-वहम-ओ-गुमाँ लिए
मिरे दिल में फिर भी बसा हुआ तिरा नाम रद्द-ए-बला सा है
ये मसाफ़तें शब-ए-तार की ये न ख़त्म होने के सिलसिले
अभी फ़ासला रग-ए-जाँ से है तो हनूज़ गरचे ज़रा सा है
तिरे ख़त्त-ए-हुस्न-ओ-जमाल को मिरे हर्फ़-ए-आइना-ए-साज़ ने
कई रंग दे दिए पुर-कशिश मगर अब भी एक ख़ला सा है
ग़ज़ल
तिरे शहर-ए-अम्न का क्या कहें कि हर इक मकान जुदा सा है
अफ़ीफ़ सिराज

