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तिरे ख़याल के सदक़े ये क्या मक़ाम आया | शाही शायरी
tere KHayal ke sadqe ye kya maqam aaya

ग़ज़ल

तिरे ख़याल के सदक़े ये क्या मक़ाम आया

दिल अय्यूबी

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तिरे ख़याल के सदक़े ये क्या मक़ाम आया
कभी हयात कभी मौत का पयाम आया

तिरा ख़याल मिरा सोज़‌‌‌-ए-आरज़ू-ए-सहर
कोई तो था शब-ए-फ़ुर्क़त जो दिल के काम आया

किसी उमीद का मारा दिखाई देता था
वो ख़ुश-नसीब परिंदा जो ज़ेर-ए-दाम आया

किसी के ख़त में कहें ज़िक्र तक न था उस का
वो इक पयाम-ए-ख़ुसूसी जो दिल के नाम आया

न पूछ कितनी हयात-आफ़रीं है राह-ए-वफ़ा
सुना है 'दिल' भी उसी मरहले में काम आया