तिरे ख़याल के सदक़े ये क्या मक़ाम आया
कभी हयात कभी मौत का पयाम आया
तिरा ख़याल मिरा सोज़-ए-आरज़ू-ए-सहर
कोई तो था शब-ए-फ़ुर्क़त जो दिल के काम आया
किसी उमीद का मारा दिखाई देता था
वो ख़ुश-नसीब परिंदा जो ज़ेर-ए-दाम आया
किसी के ख़त में कहें ज़िक्र तक न था उस का
वो इक पयाम-ए-ख़ुसूसी जो दिल के नाम आया
न पूछ कितनी हयात-आफ़रीं है राह-ए-वफ़ा
सुना है 'दिल' भी उसी मरहले में काम आया
ग़ज़ल
तिरे ख़याल के सदक़े ये क्या मक़ाम आया
दिल अय्यूबी

