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तिरे जमाल से हम रूनुमा नहीं हुए हैं | शाही शायरी
tere jamal se hum runuma nahin hue hain

ग़ज़ल

तिरे जमाल से हम रूनुमा नहीं हुए हैं

इरफ़ान सत्तार

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तिरे जमाल से हम रूनुमा नहीं हुए हैं
चमक रहे हैं मगर आइना नहीं हुए हैं

धड़क रहा है तू इक इस्म की है ये बरकत
वगरना वाक़िए इस दिल में क्या नहीं हुए हैं

बता न पाएँ तो ख़ुद तुम समझ ही जाओ कि हम
बिला जवाज़ तो बे-माजरा नहीं हुए हैं

तिरा कमाल कि आँखों में कुछ ज़बान पे कुछ
हमें तो मो'जिज़े ऐसे अता नहीं हुए हैं

ये मत समझ कि कोई तुझ से मुन्हरिफ़ ही नहीं
अभी हम अहल-ए-जुनूँ लब-कुशा नहीं हुए हैं

ब-नाम-ए-ज़ौक़-ए-सुख़न ख़ुद-नुमाई आप करें
हम इस मरज़ में अभी मुब्तला नहीं हुए हैं

हमी वो जिन का सफ़र मावरा-ए-वक़्त-ओ-वजूद
हमी वो ख़ुद से कभी जो रिहा नहीं हुए हैं

ख़ुद-आगही भी खड़ी माँगती है अपना हिसाब
जुनूँ के क़र्ज़ भी अब तक अदा नहीं हुए हैं

किसी ने दिल जो दुखाया कभी तो हम 'इरफ़ान'
उदास हो गए लेकिन ख़फ़ा नहीं हुए हैं