तिरे इंतिज़ार में क्या मिला तिरे ए'तिबार ने क्या दिया
कभी कोई ज़ख़्म तपाँ हुआ कभी कोई दाग़ खिला दिया
ये शब-ए-सफ़र भी वबाल है न फ़िराक़ है न विसाल है
इसी शब ने नींद हराम की इसी शब ने हम को सुला दिया
मिरे शहर-ए-गुल मिरी अर्ज़-ए-जाँ कहीं कोई उन का भी है निशाँ
तिरी बे-ख़याल हवाओं ने जिन्हें रास्ते से हटा दिया
जिसे दस्त-ए-ज़ुल्म छुपा सके न हवा-ए-जौर बुझा सके
सर-ए-राह-ए-मंज़िल-ए-ज़िंदगी वो चराग़ हम ने जला दिया
यही ग़म गराँ था सो रफ़्ता रफ़्ता तिरे सुरूर-ए-ख़याल ने
सफ़र-ए-हयात की मुश्किलात को भूलना भी सिखा दिया
ग़ज़ल
तिरे इंतिज़ार में क्या मिला तिरे ए'तिबार ने क्या दिया
इसहाक़ अतहर सिद्दीक़ी

