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तिरे आगे अदू को नामा-बर मारा तो क्या मारा | शाही शायरी
tere aage adu ko nama-bar mara to kya mara

ग़ज़ल

तिरे आगे अदू को नामा-बर मारा तो क्या मारा

निज़ाम रामपुरी

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तिरे आगे अदू को नामा-बर मारा तो क्या मारा
न मारा जाँ से जिस दम उस को गर मारा तो क्या मारा

अगर दिल मारते अपना तो क्यूँ ये ज़िल्लतें पाते
तिरी ख़्वाहिश में ज़ालिम हम ने सर मारा तो क्या मारा

वो मारें क़हक़हा सुन कर मिरी सीना-ज़नी का हाल
इधर मारा तो क्या मारा उधर मारा तो क्या मारा

तुम्हारे हाथ तो ले लेता अपने हाथ से हैहात
दुपट्टे से जो पहोंचे बाँध कर मारा तो क्या मारा

न देखो दूर से ही मुझ को इन टेढ़ी निगाहों से
किसी को तीर तुम ने फेंक कर मारा तो क्या मारा

सबा ये कब जलन होती जो शाम-ए-हिज्र गुल होती
तपांचा शम्अ को वक़्त-ए-सहर मारा तो क्या मारा

हुआ है मेरी रुस्वाई से तेरे हुस्न का शोहरा
जो मुझ को जाँ से ऐ बेदाद-गर मारा तो क्या मारा

तिरी दूरी में बे-तासीर गर रोए तो क्या रोए
तिरी फ़ुर्क़त में नारा बे-असर मारा तो क्या मारा

कहीं होता है दिल का जोश-ए-सौदा कम अबस रगज़न
रगों में मेरी तू ने नेश्तर मारा तो क्या मारा

'निज़ाम' इस नफ़्स-ए-अम्मारा की गर्दन भी कभी तोड़ी
जवाँ-मर्दी का दम तुम ने अगर मारा तो क्या मारा