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तिरछी नज़र से देखिए तलवार चल गई | शाही शायरी
tirchhi nazar se dekhiye talwar chal gai

ग़ज़ल

तिरछी नज़र से देखिए तलवार चल गई

मुनीर शिकोहाबादी

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तिरछी नज़र से देखिए तलवार चल गई
ज़ख़्म-ए-जिगर की राह से हसरत निकल गई

मल-दल से वस्ल में तिरी महरम निकल गई
चुटकी से ऐ परी बुनत अंगिया की मल गई

बुलबुल को मस्त करती है ख़ुशबू लिबास की
शायद नसीम इत्र-ए-बहार आज मल गई

कंघी से इतनी देर में सुलझाई एक ज़ुल्फ़
ऐ जान आधी रात बखेड़े में ढल गई

मज़मून तेरी ज़र्द हिना का न बंध सका
मनहद की मछली हाथ में आ कर निकल गई

इतना न कीजिए गुल-ए-रुख़्सार पर ग़ुरूर
दो दिन की ये बहार है आज आई कल गई

अंदाज़ तेरे हाल की सीखी जो रात को
तेग़-ए-हिलाल कब्क पर ऐ माह चल गई

सर से हमारे फिर गई शमशीर-ए-बर्क़-दम
ऐ जान गिरते गिरते ये बिजली सँभल गई

क्या साफ़ गाल हैं कि न ठहरे नज़र कहीं
बे-साख़्ता निगाह हमारी फिसल गई

रंग-ए-वफ़ा उड़ा दिल-ए-सख़्त-ए-रक़ीब से
बोतल में ये शराब न ठहरी उबल गई

क्यूँ चश्म-ए-मस्त हो गए जाम-ए-शराब आज
क्या हो गया जो आँख तुम्हारी बदल गई

मज़मून-ए-गर्म पर मेरे तअना न कर सके
अंगुश्त-ए-ए'तिराज़ हरीफ़ों की चल गई

मिट्टी मिरी ख़राब हुई राह-ए-इश्क़ में
बर्बाद कर के उन की सवारी निकल गई

मुझ से ही पूछता है मिरा नामा-बर पता
ऐसी फ़िराक़-ए-यार में सूरत बदल गई

ऐ शोख़ तेरी दस्त-दराज़ी से नश्शे में
गर्दूं तक आफ़्ताब की पगड़ी उछल गई

दे कर मय-ए-दो-आतिशा उस से लिपट गया
दो आँचों में रक़ीब की क्या दाल गल गई

जन्नत से बहरा-वर हों ज़फ़र-गंज ऐ 'मुनीर'
जो जो थी आरज़ू मिरे दिल में निकल गई