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तिरा लुत्फ़ आतिश-ए-शौक़ को हद-ए-ज़िंदगी से बढ़ा न दे | शाही शायरी
tera lutf aatish-e-shauq ko had-e-zindagi se baDha na de

ग़ज़ल

तिरा लुत्फ़ आतिश-ए-शौक़ को हद-ए-ज़िंदगी से बढ़ा न दे

आनंद नारायण मुल्ला

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तिरा लुत्फ़ आतिश-ए-शौक़ को हद-ए-ज़िंदगी से बढ़ा न दे
कहीं बुझ न जाए चराग़ ही उसे देख इतनी हवा न दे

तिरा ग़म है दौलत-ए-दिल तिरी उसे आँसुओं में लुटा न दे
वही आह नक़्द-ए-हयात है जिसे लब पे ला के गँवा न दे

मिरी ज़िंदगी की हक़ीक़तों को न पूँछ और मैं क्या कहूँ
मिरा दोस्त आज वही है जो मुझे ज़िंदगी की दुआ न दे

यही ज़िंदगी ने सबक़ दिया कि कभी फ़रेब-ए-करम न खा
ये उमीद रख न किसी से तू कि मिटा सके तो मिटा न दे

मुझ ग़म ही दे न ख़ुशी सही न करम सही तो सितम सही
मगर इतना कम भी करम न हो कि तिरा सितम भी मज़ा न दे

मिरे दिल की ख़ुद ये मजाल थी कि वो शाम-ए-ग़म को सहर करे
तिरी याद आ के घड़ी घड़ी अगर आँसुओं को हँसा न दे

तिरे दिल पे हक़ है जहाँ का भी ये फ़रार-ए-इश्क़ रवा नहीं
ग़म-दोस्त ख़ूब है जब तलक ग़म-ए-ज़िंदगी को भुला न दे

वो ख़ुदा-ए-हुस्न ही क्यूँ न हो कोई शय है ग़ैरत-ए-इश्क़ भी
जो तिरी सदा पे खुले न दर वो खुले भी जब तो सदा न दे

मिरे दुश्मनों के लबों पे थी जो हँसी वो 'मुल्ला' अब उड़ चली
उन्हें डर है अब यही ग़म मिरा मिरी ज़िंदगी को बना न दे