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तिरा जमाल तिरा हुस्न कामगार रहे | शाही शायरी
tera jamal tera husn kaamgar rahe

ग़ज़ल

तिरा जमाल तिरा हुस्न कामगार रहे

एहसान दानिश

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तिरा जमाल तिरा हुस्न कामगार रहे
वो क्या करे न जिसे दिल पे इख़्तियार रहे

हज़ार कसरत-ए-रा'ना ने चिलमनें डालीं
ब-हर-हिजाब-ए-तअ'य्युन वो आश्कार रहे

मिरी नज़र का तो क्या ज़िक्र ख़ुद बहार के फूल
फ़रेब-ख़ुर्दा-ए-रंगीनी-ए-बहार रहे

किसी मक़ाम पे दिल को सुकूँ हो क्या मा'नी
जो बेक़रार-ए-अज़ल है वो बे-क़रार रहे

उसी नवाह में अहल-ए-नज़र भी मुमकिन हैं
कुछ और देर सर-ए-तूर इंतिज़ार रहे

तमाम फूल थे और ज़र्फ़-ए-दामन-ए-गुलचीं
जो बच गए वो चराग़-ए-शब-बहार रहे

मिरी निगाह में है वो हरीम-ए-ज़ेबाई
कनीज़ बन के जहाँ मरियम-ए-बहार रहे

ख़िज़ाँ ख़िज़ाँ हो तो दौर-ए-बहार क्या मा'नी
बहार हो तो ख़िज़ाँ क्यूँ बने बहार रहे

जहान-ए-हुस्न के असरार पा नहीं सकता
जो इश्क़ अपनी हदों तक ही बे-क़रार रहे

मिरी नज़र से वो जल्वे न रह सके मस्तूर
जो ज़ेर-ए-पर्दा-ए-पैराहन-ए-बहार रहे

छुड़ा चुका हूँ मैं दस्त-ए-मजाज़ से दामन
हक़ीक़त अपने हिजाबों से होशियार रहे

मैं मोड़ता हूँ इसी रुख़ से कारवाँ अपना
कुछ और देर उफ़ुक़ पर अभी ग़ुबार रहे

जुनून-ए-शौक़ में तहक़ीक़-ए-रंग-ओ-बू कैसी
रहे चमन में तो दीवाना-ए-बहार रहे

हैं इस तरह के ज़वाबित भी बे-क़रारी में
कि तेरे साथ ज़माना भी बे-क़रार रहे

वो सिर्फ़ मेरे हैं 'एहसान' मैं फ़क़त उन का
है नागवार किसी को तो नागवार रहे