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तिरा है काम कमाँ में उसे लगाने तक | शाही शायरी
tera hai kaam kaman mein use lagane tak

ग़ज़ल

तिरा है काम कमाँ में उसे लगाने तक

इफ़्तिख़ार नसीम

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तिरा है काम कमाँ में उसे लगाने तक
ये तीर ख़ुद ही चला जाएगा निशाने तक

मैं शीशा क्यूँ न बना आदमी हुआ क्यूँकर
मुझे तो उम्र लगी टूट फूट जाने तक

गए हुओं ने पलट कर सदा न दी मुझ को
मैं कितनी बार गया ग़ार के दहाने तक

तुझे तो अपने परों पर ही ए'तिबार नहीं
तू कैसे आएगा उड़ कर मिरे ज़माने तक

किया था फ़ैसला बुनियाद-ए-आशियाँ का 'नसीम'
हवाएँ तिनके उड़ा लाईं आशियाने तक