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तिरा ग़म दिल पे इफ़्शा कर रहे हैं | शाही शायरी
tera gham dil pe ifsha kar rahe hain

ग़ज़ल

तिरा ग़म दिल पे इफ़्शा कर रहे हैं

मुबीन मिर्ज़ा

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तिरा ग़म दिल पे इफ़्शा कर रहे हैं
सो दिल से कार-ए-दुनिया कर रहे हैं

तुझे अब क्या बताएँ हम तिरे बा'द
ब-नाम-ए-ज़ीस्त क्या क्या कर रहे हैं

हज़ारों रंज पै-दर-पै उठा कर
बस इक ग़म का मुदावा कर रहे हैं

कुछ ऐसा है ग़म-ए-तन्हाई दर-पेश
कि इक आलम को अपना कर रहे हैं

कभी जो काम चाहत से किए थे
उन्हीं का आज सदमा कर रहे हैं

ये ज़ख़्म-ए-दिल सलामत हम इसी को
मुक़द्दर का सितारा कर रहे हैं

किसी सूरत जो पूरी हो न पाए
हम इक ऐसी तमन्ना कर रहे हैं

जो करना चाहते थे बिल-इरादा
वो सब कुछ बे-इरादा कर रहे हैं

उन्ही लोगों को है दुनिया मयस्सर
कि जो उस से किनारा कर रहे हैं

वही करने की हसरत जाँ-गुसिल है
कि जो करने का चर्चा कर रहे हैं