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थी आसमाँ पे मेरी चढ़ाई तमाम रात | शाही शायरी
thi aasman pe meri chaDhai tamam raat

ग़ज़ल

थी आसमाँ पे मेरी चढ़ाई तमाम रात

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

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थी आसमाँ पे मेरी चढ़ाई तमाम रात
फेंका किया हूँ तीर-ए-हवाई तमाम रात

वो मय-परस्त हूँ कि न पाई अगर शराब
की ख़ून-ए-दिल से कार-रवाई तमाम रात

हम-ख़ाना-ए-अदू है मुबारक रहे उसे
झगड़ा तमाम रोज़ लड़ाई तमाम रात

क्या ख़ुश रहा मैं दोस्त की तस्वीर जान कर
थी कल जो मह की जल्वा-नुमाई तमाम रात

बिखरी रही है शब मिरे बाज़ू पे ज़ुल्फ़-ए-यार
करता रहा हूँ ग़ालिया-साई तमाम रात

बढ़ता रहा बदन में मिरे दम-ब-दम लहू
सीने पे था वो दस्त-ए-हिनाई तमाम रात

था मेरे हौसले से ज़ियादा ग़म-ए-फ़िराक़
इक दास्तान उस को सुनाई तमाम रात

शर्म-ए-सितम ने वस्ल में कैसा सितम किया
शक्ल उस ने कल मुझे न दिखाई तमाम रात

सच्चे हैं अपने वा'दे के आते वो ख़्वाब में
'नाज़िम' मुझी को नींद न आई तमाम रात