थकन की गर्द से ख़ुश-रंग आहटों में आ
अदावतों को भुला दे मोहब्बतों में आ
न-जाने कब से तिरा इंतिज़ार है मुझ को
कि नींद तोड़ के बे-ख़्वाब रास्तों में आ
मिरे ख़याल के साए तिरे बदन के अक्स
पुकारते हैं मुलाक़ात की हदों में आ
लिपट गई है मिरे ज़ेहन से तिरी ख़ुशबू
मैं जल रहा हूँ कि बारिश के मौसमों में आ
सफ़र की धूप पिघल जाएगी पुरानी है
गुलाब बन के महक मेरी धड़कनों में आ
बिछड़ना है तो बिछड़ जा तबस्सुमों के साथ
जो मुझ से प्यार है तुझ को तो पत्थरों में आ
जो शख़्स शोला-ए-जाँ बन गया नुमाइश में
तुझे न लूट ले वो मेरी धड़कनों में आ
ग़ज़ल
थकन की गर्द से ख़ुश-रंग आहटों में आ
जाज़िब क़ुरैशी

