था नज़्म-ए-बख़्त-तीरा मुक़ाबिल तमाम रात
आँखों तले फिरा मिरे क़ातिल तमाम रात
हारूत साँ ज़क़न में रहा दिल तमाम रात
गुज़री मियाना-ए-चह-ए-बाबिल तमाम रात
किस गुल ने गुल किया था मिरी शम-ए-गोर को
था क़ब्र पर हुजूम-ए-अनादिल तमाम रात
धब्बा लगे न रंग-ए-सफ़ेद-ओ-सियाह में
है गो तमाम दिन के मुक़ाबिल तमाम रात
रौशन थी सुब्ह तक मिरे मदफ़न पे शम-ए-तूर
रोया खड़े खड़े मिरा क़ातिल तमाम रात
ऐ रश्क-ए-मेहर-ओ-मह तिरे मुँह पर निसार है
सूरज तमाम दिन मह-ए-कामिल तमाम रात
जाती थी याद गेसू ओ रुख़ में फ़लक पे आह
महताब था असीर-ए-सलासिल तमाम रात
करते हैं गुल जो चाक गरेबाँ तमाम दिन
सुनते हैं नाला-हा-ए-अनादिल तमाम रात
कहता था 'अर्श' सच में समझता था झूट यार
करता रहा है हक़ को वो बातिल तमाम रात
ग़ज़ल
था नज़्म-ए-बख़्त-तीरा मुक़ाबिल तमाम रात
मीर कल्लू अर्श

