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तेरी ज़ुल्फ़ें तिरे रुख़्सार तिरे लब मेरे | शाही शायरी
teri zulfen tere ruKHsar tere lab mere

ग़ज़ल

तेरी ज़ुल्फ़ें तिरे रुख़्सार तिरे लब मेरे

कौसर नियाज़ी

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तेरी ज़ुल्फ़ें तिरे रुख़्सार तिरे लब मेरे
जितने पहलू हैं तिरे हुस्न के वो सब मेरे

उस से अब तर्क-ए-मोहब्बत का गिला क्या मअनी
मुझ को तस्लीम कि अतवार थे बेढब मेरे

फिर वही चाँद सर-ए-शहर चढ़े तो ऐ काश
उस से रौशन हों दर-ओ-बाम बस इक शब मेरे

जिन का हर लम्हा गुज़रता था मिरी क़ुर्बत में
दूर ओ नज़दीक नज़र आते नहीं अब मेरे

मुझ से कतरा के गुज़र जाते हैं देरीना रफ़ीक़
रास्ते देखते हैं सख़्त कठिन जब मेरे

अब अगर खुल ही गए हो तो चलो यूँही ही सही
वर्ना तुम दोस्त तो पहले भी रहे कब मेरे

क्यूँ मुझे शिद्दत-ए-एहसास अता की इतनी
तुझ से इंसाफ़ का तालिब हूँ मैं ऐ रब मेरे

ख़ल्क़ की संग-ज़नी का है ये 'कौसर' एहसान
तह में जिस के गए सब हुस्न ओ क़ुबह दब मेरे