तेरी यादों में खोए रहें मेरी जाँ
इतनी मोहलत किसे इतनी फ़ुर्सत कहाँ
जिस जगह टप से आँसू का क़तरा गिरा
एक शोला सा भड़का वहीं ना-गहाँ
हम से क्या पूछते हो हमें क्या ख़बर
आग क्यूँ लग गई आशियाँ आशियाँ
हम भटकते रहे दश्त-ए-ज़ुल्मात में
फूल हँसते रहे गुलसिताँ गुलसिताँ
हाए वो अजनबी लोग इक शहर के
आश्ना आश्ना मेहरबाँ मेहरबाँ
सच है तू ने कभी मुझ को चाहा न था
दिल कहाँ, एक होने की सूरत कहाँ
तू ने कब मुझ से बाँधा था अहद-ए-वफ़ा
ख़ारज़ारों में बस्ती नहीं तितलियाँ
'नूर' तारीकियाँ इस क़दर बढ़ गईं
मिट गए चाँद रातों के सारे निशाँ
ग़ज़ल
तेरी यादों में खोए रहें मेरी जाँ
नूर बिजनौरी

