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तेरी यादों में खोए रहें मेरी जाँ | शाही शायरी
teri yaadon mein khoe rahen meri jaan

ग़ज़ल

तेरी यादों में खोए रहें मेरी जाँ

नूर बिजनौरी

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तेरी यादों में खोए रहें मेरी जाँ
इतनी मोहलत किसे इतनी फ़ुर्सत कहाँ

जिस जगह टप से आँसू का क़तरा गिरा
एक शोला सा भड़का वहीं ना-गहाँ

हम से क्या पूछते हो हमें क्या ख़बर
आग क्यूँ लग गई आशियाँ आशियाँ

हम भटकते रहे दश्त-ए-ज़ुल्मात में
फूल हँसते रहे गुलसिताँ गुलसिताँ

हाए वो अजनबी लोग इक शहर के
आश्ना आश्ना मेहरबाँ मेहरबाँ

सच है तू ने कभी मुझ को चाहा न था
दिल कहाँ, एक होने की सूरत कहाँ

तू ने कब मुझ से बाँधा था अहद-ए-वफ़ा
ख़ारज़ारों में बस्ती नहीं तितलियाँ

'नूर' तारीकियाँ इस क़दर बढ़ गईं
मिट गए चाँद रातों के सारे निशाँ