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तेरे कूचे में जा के भूल गए | शाही शायरी
tere kuche mein ja ke bhul gae

ग़ज़ल

तेरे कूचे में जा के भूल गए

राहील फ़ारूक़

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तेरे कूचे में जा के भूल गए
ख़ुद को हम याद आ के भूल गए

ज़ख़्म ख़ंदाँ हैं आज भी मेरे
आप तो मुस्कुरा के भूल गए

बहस गो नासेहों ने अच्छी की
मुद्दआ सटपटा के भूल गए

जो भुलाए न भूलते थे सितम
सामने उन को पा के भूल गए

कौन थे क्या थे हम कहाँ के थे
जाने किस को बता के भूल गए

हम तो ख़ैर उन को भूलते थे कहाँ
वा'दे लेकिन वफ़ा के भूल गए

ऐसे भी क्या अलाव बुझते हैं
दिल को समझा-बुझा के भूल गए

हाए आँखें तो हम भी रखते थे
हाए हम तो मिला के भूल गए

भूल जाता है आदमी लेकिन
आप नज़दीक ला के भूल गए

इश्क़ 'राहील' उसी को कहते हैं
रंज उठाए उठा के भूल गए