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तेरे हैरत-ज़दगाँ और कहाँ जाते हैं | शाही शायरी
tere hairat-zadagan aur kahan jate hain

ग़ज़ल

तेरे हैरत-ज़दगाँ और कहाँ जाते हैं

मीर मोहम्मदी बेदार

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तेरे हैरत-ज़दगाँ और कहाँ जाते हैं
कहिए गर आप से जाते हैं तो हाँ जाते हैं

वे नहीं हम कि तिरे जौर से उठ जाते हैं
जी है जब लग नहीं ऐ जान-ए-जहाँ जाते हैं

कौन वो क़ाबिल-ए-कुश्तन है बताओ हम को
आप जो उस पे लिए तीर-ओ-कमाँ जाते हैं

ज्यूँ नगीं रू-सियही नाम से याँ हासिल है
नामवर वे हैं जो बेनाम-ओ-निशाँ जाते हैं

संग-ए-हस्ती से कि था माने-ए-राह-ए-मक़्सूद
जस्त कर मिस्ल-ए-शरर गर्म रवाँ जाते हैं

तुझ को फ़हमीद कहाँ शैख़ कि समझे ये रम्ज़
वाँ नहीं बार-ए-मलक यार जहाँ जाते हैं

मुझ को उस तिफ़्ल-ए-परी-रू ने किया दीवाना
होश से देख जिसे पीर ओ जवाँ जाते हैं

ग़ैर-ए-जौहर नहीं ए'राज़ से उन को कुछ काम
रंग-ओ-बू पर नहीं साहिब-नज़राँ जाते हैं

ख़्वाब 'बेदार' मुसाफ़िर के नहीं हक़ में ख़ूब
कुछ भी है तुझ को ख़बर हम-सफ़राँ जाते हैं