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तेरे हाथों से मिटेगा नक़्श-ए-हस्ती एक दिन | शाही शायरी
tere hathon se miTega naqsh-e-hasti ek din

ग़ज़ल

तेरे हाथों से मिटेगा नक़्श-ए-हस्ती एक दिन

मुनीर शिकोहाबादी

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तेरे हाथों से मिटेगा नक़्श-ए-हस्ती एक दिन
बाढ़ रख देगी छुरी पर तेज़-दस्ती एक दिन

तेरी आँखों से दिल-ए-नाज़ुक गिरेगा नश्शे में
ताक़ से शीशा गिरा देगी ये मस्ती एक दिन

ज़ाहिदो पूजा तुम्हारी ख़ूब होगी हश्र में
बुत बना देगी तुम्हें ये हक़-परस्ती एक दिन

आँखें दोज़ख़ में भी सेंकेगा तिरा दिल-सोख़्ता
आग बन जाएगी ये आतिश-परस्ती एक दिन

ख़ूबी-ए-शमशीर-ए-अबरू का तमाशा देखते
दोनों बागों आप की तलवार कसती एक दिन

ख़ून मेरा राएगाँ नाहक़ बहाते हैं हुज़ूर
करनी है रंग-ए-हिना की पेश-दस्ती एक दिन

जिल्द-ए-पिस्ताँ तक मिरा कब तक न होगा दस्तरस
इन तुरंजों की भी क़ीमत होगी सस्ती एक दिन

ज़ुल्फ़-ए-काफ़िर-केश लिपटेगी क़दम से ऐ सनम
हिंदु-ए-शब भी करेगा बुत-परस्ती एक दिन

जान बख़्शो सर मिरे लाशे का ठुकराओ कभी
साग़र-ए-ख़ाली में भर दो शहद-ए-हस्ती एक दिन

नीलगूँ कर देंगे मल कर छातियाँ ऐ रश्क-ए-मेहर
तेरी अंगिया की कटोरी होगी जस्ती एक दिन

ख़ूब कर तारीफ़-ए-नव्वाब-ए-ज़फ़र-जंग ऐ 'मुनीर'
काम आ जाएगी ये आक़ा-परस्ती एक दिन