EN اردو
तेरे दर से मैं उठा लेकिन न मेरा दिल उठा | शाही शायरी
tere dar se main uTha lekin na mera dil uTha

ग़ज़ल

तेरे दर से मैं उठा लेकिन न मेरा दिल उठा

सय्यद यूसुफ़ अली खाँ नाज़िम

;

तेरे दर से मैं उठा लेकिन न मेरा दिल उठा
छोड़ कर हो जिस तरह कासा कोई साइल उठा

क़ैस क्या जाने कि मेरा देखना मंज़ूर था
ख़ुद-बख़ुद हो जब हवा से पर्दा-ए-महमिल उठा

गिर्ये ने पहले ही अपना कर रखा था बंदोबस्त
मैं उठा भी वाँ से चलने को तो पा-दर-गिल उठा

बोसा-ए-आरिज़ मुझे देते हुए डरता है क्यूँ
लूंगा क्या नोक-ए-ज़बाँ से तिरी रुख़ का तिल उठा

जब उठा ख़ंजर न उस से इस अदा पर मर गए
हम से भी गोया न बार-ए-मिन्नत-ए-क़ातिल उठा

शिकवा-ए-बार-ए-ग़म-ए-हिज्राँ है ख़त में मुंदरज
नामा-बर कब हो के मेरे नामी का हाइल उठा

ग़ैर ने आ कर नहीं की गुदगुदी गर ख़्वाब में
नींद से क्यूँ इस तरह हँसता हुआ खिल-खिल उठा

गरचे रखता हूँ कहीं और पाँव पड़ता है कहीं
पर ग़नीमत है कि है मुँह जानिब-ए-मंज़िल उठा

अश्क गो आतिश नहीं 'नाज़िम' मगर तेज़ाब है
देख चश्म-ए-तर से अपनी आस्तीं ग़ाफ़िल उठा