तेग़-ए-पुर-ख़ूँ वो अगर धोए कनार-ए-दरिया
ख़ंदा-ज़न रंग-ए-चमन पर हो बहार-ए-दरिया
अतश-ए-इश्क़ की लज़्ज़त ये मिली है हम को
जा गिरें आग में और हों न दोचार-ए-दरिया
दुर्रा-ए-मौज लगाता है उसे बे-तक़सीर
क्यूँ न हो लाशा मिरा शिकवा-गुज़ार-ए-दरिया
सुर्ख़ी-ए-अक्स-ए-शफ़क़ पर जो पड़ा लब का गुमाँ
लाल-ओ-याक़ूत किए हम ने निसार-ए-दरिया
नख़्ल-ए-ख़्वाहिश जो नहीं होता है इस से सरसब्ज़
गिर्या करता है मिरा ख़ंदा ब-कार-ए-दरिया
मछलियाँ लख़्त-ए-जिगर बनती हैं दरिया आँसू
किस गुल-ए-तर को हुआ शौक़-ए-शिकार-ए-दरिया
क्या गुल-अंदाम कोई इस में नहाया था जो आज
रग-ए-गुल से हैं मोअत्तर ख़स-ओ-ख़ार-ए-दरिया
किस की ज़ुल्फ़-ए-अरक़-अफ़्शाँ का तसव्वुर है उन्हें
लिपटे ही जाते हैं बहरों से जो मार-ए-दरिया
सैल-ए-आफ़ात में तन देते हैं जो ऐ 'ग़ाफ़िल'
मिस्ल-ए-ख़ाशाक वो रहते हैं सवार-ए-दरिया
ग़ज़ल
तेग़-ए-पुर-ख़ूँ वो अगर धोए कनार-ए-दरिया
मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल

