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तश्हीर अपने दर्द की हर सू कराइए | शाही शायरी
tashhir apne dard ki har su karaiye

ग़ज़ल

तश्हीर अपने दर्द की हर सू कराइए

अमजद इस्लाम अमजद

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तश्हीर अपने दर्द की हर सू कराइए
जी चाहता है मिन्नत-ए-तिफ़्लाँ उठाइए

ख़ुश्बू का हाथ थाम के कीजे तलाश-ए-रंग
पाँव के नक़्श देख के रस्ता बनाइए

फिर आज पत्थरों से मुलाक़ात कीजिए
फिर आज सत्ह-ए-आब पे चेहरे बनाइए

हर इंकिशाफ़ दर्द के पर्दे में आएगा
गर हो सके तो ख़ुद से भी ख़ुद को छुपाए

फूलों का रास्ता नहीं यारो मिरा सफ़र
पाँव अज़ीज़ हैं तो अभी लूट जाइए

कब तक हिना के नाम पे देते रहें लहू
कब तक निगार-ए-दर्द को दुल्हन बनाइए

'अमजद' मता-ए-उम्र ज़रा देख-भाल के
ऐसा न हो कि बा'द में आँसू बहाइए