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तसव्वुर से किसी के मैं ने की है गुफ़्तुगू बरसों | शाही शायरी
tasawwur se kisi ke maine ki hai guftugu barson

ग़ज़ल

तसव्वुर से किसी के मैं ने की है गुफ़्तुगू बरसों

हैदर अली आतिश

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तसव्वुर से किसी के मैं ने की है गुफ़्तुगू बरसों
रही है एक तस्वीर-ए-ख़याली रू-ब-रू बरसों

हुआ मेहमान आ कर रात भर वो शम्अ'-रू बरसों
रहा रौशन मिरे घर का चराग़-ए-आरज़ू बरसों

बराबर जान के रक्खा है उस को मरते मरते तक
हमारी क़ब्र पर रोया करेगी आरज़ू बरसों

चमन में जा के भूले से मैं ख़स्ता-दिल कराहा था
किया की गुल से बुलबुल शिकवा-ए-दर्द-ए-गुलू बरसों

अगर मैं ख़ाक भी हूँगा तो 'आतिश' गर्द-बाद-आसा
रखेगी मुझ को सर-गश्ता किसी की जुस्तुजू बरसों