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तसव्वुर आप का है और मैं हूँ | शाही शायरी
tasawwur aap ka hai aur main hun

ग़ज़ल

तसव्वुर आप का है और मैं हूँ

निज़ाम रामपुरी

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तसव्वुर आप का है और मैं हूँ
यही अब मशग़ला है और मैं हूँ

मिरी ज़िद से मिला फिर दुश्मनों से
बस अब वो बेवफ़ा है और मैं हूँ

वो हो और मैं हूँ और कोई न हो ग़ैर
यही हर-दम दुआ है और मैं हूँ

तसव्वुर में हैं पहरों उन से बातें
शिकायत का मज़ा है और मैं हूँ

तुम्हारी ख़ू है रंजिश हर घड़ी की
ये झगड़ा रोज़ का है और मैं हूँ

इलाही वस्ल है या ख़्वाब है ये
हुसूल-ए-मुद्दआ है और मैं हूँ

हज़ारों ग़म तो देखे उस से मिल कर
वही फिर हौसला है और मैं हूँ

सहे क्या क्या सितम और अब तलक भी
तमन्ना है वफ़ा है और मैं हूँ

गए वो तो जहाँ जाना था उन को
अब उन का नक़्श-ए-पा है और मैं हूँ

हर इक से हाल-ए-दिल कहता हूँ अपना
ये चर्चा जा-ब-जा है और मैं हूँ

दो आलम की ख़ुशी से कुछ नहीं काम
फ़क़त इक ग़म तिरा है और मैं हूँ

वो है और अहद-नामे हैं अदू से
नसीबों का लिखा है और मैं हूँ

ग़म-ए-दूरी क़यामत है कि हर-दम
अजल का सामना है और मैं हूँ

ख़ुदा की जन्नतें हैं और है ख़ल्क़
सनम कूचा तिरा है और मैं हूँ

सहर होते ही जाते ही किसी के
वही आह-ओ-बुका है और मैं हूँ

'निज़ाम' उस बुत के ग़म में हो तसल्ली
बस इक ज़ात-ए-ख़ुदा है और मैं हूँ