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तसलसुल से गुमाँ लिक्खा गया है | शाही शायरी
tasalsul se guman likkha gaya hai

ग़ज़ल

तसलसुल से गुमाँ लिक्खा गया है

दानियाल तरीर

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तसलसुल से गुमाँ लिक्खा गया है
यक़ीं तो ना-गहाँ लिक्खा गया है

मुकम्मल हो चुकी क़िरअत फ़ज़ा की
परिंदे और धुआँ लिक्खा गया है

मिरा दो पल ठहर कर साँस लेना
सर-ए-आब-ए-रवाँ लिक्खा गया है

उगाएगी सितारे अब ये मिट्टी
ज़मीं पर आसमाँ लिखा गया है

किताब-ए-ग़ैब पढ़ता जा रहा हूँ
मिरा होना कहाँ लिक्खा गया है

नहीं लिक्खा गया काग़ज़ पे कुछ भी
फ़क़त आइंदगाँ लिक्खा गया है