तर्क ख़्वाहिश-ए-ज़र कर कीमिया-गरी ये है
दिल में रख ख़याल-ए-दोस्त शीशा-ओ-परी ये है
देख हो गई नर्गिस बाग़ में तुझे हैराँ
शोख़-चश्म जादूगर तेरी साहिरी ये है
ज़ुल्फ़ तेरी अफ़्सूँ-गर चश्म तेरी पुर-जादू
वो है सेहर-ए-बंगाला सेहर-ए-सामरी ये है
मेरे आह भरने पर शब को तू जो हँसता है
वो अजब हवाई है ज़ोर-ए-फुलझड़ी ये है
साल तब थे पल जैसे आन अब क़रन सी है
वस्ल के बरस वो थे हिज्र की घड़ी ये है
माह-रू के कानों में गोश्वारे रख़्शाँ हैं
देख 'इश्क़' वो ज़ोहरा और मुश्तरी ये है
ग़ज़ल
तर्क ख़्वाहिश-ए-ज़र कर कीमिया-गरी ये है
इश्क़ औरंगाबादी

