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तरीक़-ए-इश्क़ में अंदेशा-ए-ज़ियाँ न रहा | शाही शायरी
tariq-e-ishq mein adnesha-e-ziyan na raha

ग़ज़ल

तरीक़-ए-इश्क़ में अंदेशा-ए-ज़ियाँ न रहा

ऋषि पटियालवी

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तरीक़-ए-इश्क़ में अंदेशा-ए-ज़ियाँ न रहा
उसी का नाम रहा जिस का कुछ निशाँ न रहा

कहीं गुलों में कहीं महर-ओ-माह-ओ-अंजुम में
नज़र नज़र के लिए वो कहाँ कहाँ न रहा

लिए थे बढ़ के क़दम जिस के क़ुर्ब-ए-मंज़िल ने
वो कारवाँ न रहा मीर-ए-कारवाँ न रहा

जिन्हों ने ख़ून से की आबियारी-ए-गुलशन
उन्हीं का सेहन-ए-गुलिस्ताँ में आशियाँ न रहा

ये सानेहा है कि राहें तो हैं नई लेकिन
किसी उसूल पे दस्तूर-ए-कारवाँ न रहा

नज़र-नवाज़ था जब मंज़र-ए-गुल-ओ-ग़ुन्चा
चमन में अगली बहारों का वो समाँ न रहा

वो दिन भी थे कि तअ'ल्लुक़ था हम-नवाओं से
ये वक़्त भी है कि अब कोई हम-ज़बाँ न रहा

हमें भी अब तो ये हर्फ़-ए-ग़लत सा लगता है
हमारा नाम कि जो ज़ेब-ए-दास्ताँ न रहा

दिया था नाम जिसे राह-ओ-रस्म-ए-उल्फ़त का
'रिशी' वो मश्ग़ला-ए-सई-ए-राएगाँ न रहा