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तराना-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ है हर ख़ुशी अपनी | शाही शायरी
tarana-e-gham-e-pinhan hai har KHushi apni

ग़ज़ल

तराना-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ है हर ख़ुशी अपनी

अमजद नजमी

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तराना-ए-ग़म-ए-पिन्हाँ है हर ख़ुशी अपनी
कि एक दर्द-ए-मुसलसल है ज़िंदगी अपनी

बहल न जाए कहीं ये दिल-ए-ख़िज़ाँ-मानूस
बहार आ के दिखाती है दिलकशी अपनी

किसी के चेहरा-ए-ज़ेबा से उस को क्या निस्बत
यूँही बिखेरा करे चाँद चाँदनी अपनी

शुऊ'र-ए-चाक-ए-गरेबाँ किधर है दामन-ए-यार
जुनूँ की हद से मिली जा के आशिक़ी अपनी

बता कि ये भी कोई शान-ए-बे-नियाज़ी है
सुनी न हाए कोई तू ने गुफ़्तनी अपनी