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तक़दीर से करें कि गिला बाग़बाँ से हम | शाही शायरी
taqdir se karen ki gila baghban se hum

ग़ज़ल

तक़दीर से करें कि गिला बाग़बाँ से हम

शोला करारवी

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तक़दीर से करें कि गिला बाग़बाँ से हम
छोड़ा है कब छुड़ाए गए आशियाँ से हम

फ़ुर्क़त में काम लेते तो ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ से हम
लाते मगर ये दिल ये कलेजा कहाँ से हम

तफ़्सील-ए-बज़्म-ए-हुस्न सुनाईं कहाँ से हम
जब आए दरमियाँ में उठे दरमियाँ से हम

मंज़िल पे पहुँचे क़ाफ़िला वाले मगर हनूज़
खेला किए ग़ुबार-ए-पस-ए-कारवाँ से हम

कट जाए शाख़-ए-ज़ीस्त से पत्ता न जाने कब
बाग़-ए-जहाँ में अब तो हैं बर्ग-ए-ख़िज़ाँ से हम

अहद-ए-शबाब में जो बररते थे मिस्ल-ए-तीर
पीरी में देखते हैं उन्हीं को कमाँ से हम

फिर हम समझते मिल गई हम को वफ़ा की दाद
रूदाद-ए-इश्क़ सुनते जो उन की ज़बाँ से हम

दुनिया का रंज है न तो उक़्बा की फ़िक्र है
यूँ बे-नियाज़ हो गए दोनों-जहाँ से हम

क्या जाने कोई अश्क-ए-नदामत की आबरू
लाए हैं तारे तोड़ के ये आसमाँ से हम

मंज़िल शनास-ए-राह-ए-हक़ीक़त से पूछिए
हम से ये कारवाँ है कि हैं कारवाँ से हम

'शो'ला' समझ में आएँगे क्या राज़-हा-ए-इशक़
जब तक कि आश्ना न हों दर्द-ए-निहाँ से हम