तंग नद्दी के तड़पते हुए पानी की तरह
हम ने डाली है नई एक रवानी की तरह
ढलते ढलते भी ग़ज़ब ढाए गया हिज्र का दिन
किसी काफ़िर की जुनूँ-ख़ेज़ जवानी की तरह
ऐसी वहशत का बुरा हो कि हम अपने घर से
ग़म हुए ख़ुद भी मोहब्बत की निशानी की तरह
नंगे सच काबिल-ए-बरदाश्त कहाँ होते हैं
वाक़िआ' कहिए तो कहियेगा कहानी की तरह
पास रक्खें तो मलाल आग लगाएँ तो मलाल
दिल भी है क्या किसी तस्वीर पुरानी की तरह
इश्क़ है मदरसा-ए-ज़ीस्त की उखड़ी हुई ईंट
हमा-दानी की तरह हेच-मुदानी की तरह
ये ग़ज़ल हज़रत-ए-'राहील' की है ध्यान रहे
आप पोशीदा हैं लफ़्ज़ों में मआ'नी की तरह
ग़ज़ल
तंग नद्दी के तड़पते हुए पानी की तरह
राहील फ़ारूक़

