तन से जाँ का क़दम निकलता है
अब कोई दम में दम निकलता है
सैर कर इंक़िलाब-ए-आलम की
ठेकरा ले के जम निकलता है
ऐ परी शब जो हूर को देखा
तेरा अंदाज़ कम निकलता है
ख़ल्क़ मरती है कू-ए-क़ातिल में
तौर-ए-मुल्क-ए-अदम निकलता है
छोड़ बुत-ख़ाने को तिरे हाथों
बरहमन ऐ सनम निकलता है
कूचा-ए-ज़ुल्फ़ से तिरे ऐ बुत
बच के शैख़-ए-हरम निकलता है
साफ़ ऐ हूर तेरे कूचे में
रंग-ए-बाग़-ए-इरम निकलता है
जान-ए-जाँ तुझ पे जान जाती है
दम निकलता है दम निकलता है
तेग़-ए-क़ातिल है 'अर्श' ज़हर-आलूद
मेरे ज़ख़्मों से सम निकलता है
ग़ज़ल
तन से जाँ का क़दम निकलता है
मीर कल्लू अर्श

