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तन से जाँ का क़दम निकलता है | शाही शायरी
tan se jaan ka qadam nikalta hai

ग़ज़ल

तन से जाँ का क़दम निकलता है

मीर कल्लू अर्श

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तन से जाँ का क़दम निकलता है
अब कोई दम में दम निकलता है

सैर कर इंक़िलाब-ए-आलम की
ठेकरा ले के जम निकलता है

ऐ परी शब जो हूर को देखा
तेरा अंदाज़ कम निकलता है

ख़ल्क़ मरती है कू-ए-क़ातिल में
तौर-ए-मुल्क-ए-अदम निकलता है

छोड़ बुत-ख़ाने को तिरे हाथों
बरहमन ऐ सनम निकलता है

कूचा-ए-ज़ुल्फ़ से तिरे ऐ बुत
बच के शैख़-ए-हरम निकलता है

साफ़ ऐ हूर तेरे कूचे में
रंग-ए-बाग़-ए-इरम निकलता है

जान-ए-जाँ तुझ पे जान जाती है
दम निकलता है दम निकलता है

तेग़-ए-क़ातिल है 'अर्श' ज़हर-आलूद
मेरे ज़ख़्मों से सम निकलता है