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तन-ए-बे-जाँ में अब रहा क्या है | शाही शायरी
tan-e-be-jaan mein ab raha kya hai

ग़ज़ल

तन-ए-बे-जाँ में अब रहा क्या है

पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़

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तन-ए-बे-जाँ में अब रहा क्या है
देखिए मर्ज़ी-ए-ख़ुदा क्या है

अपनी हालत पे आज रोता है
दिल-ए-दीवाना को हुआ क्या है

ऐ तबीबो तुम्हें ख़ुदा की क़सम
सच बता दो कि माजरा क्या है

मैं ख़तावार ही सही लेकिन
सुन तो लो पहले माजरा क्या है

न खुला आज तक किसी पर भी
ख़त-ए-तक़्दीर में लिखा क्या है

क्यूँ ये चुप चुप गए अदम वाले
या-इलाही ये माजरा क्या है

लब-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर तो हँसते हैं
तू ने ऐ बख़िया-गर सिया क्या है

दिल तो क्या जान इश्क़ में दे दी
ये न पूछा कि मुद्दआ' क्या है

उठ के पिछले से आहों का भरना
'शौक़' तेरा ये मश्ग़ला क्या है