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तमाम रात हवा चीख़ती रही बन में | शाही शायरी
tamam raat hawa chiKHti rahi ban mein

ग़ज़ल

तमाम रात हवा चीख़ती रही बन में

नूर बिजनौरी

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तमाम रात हवा चीख़ती रही बन में
तमाम रात उड़ी ख़ाक दिल के आँगन में

है अक़्ल ज़हर जुनूँ ज़हर-ए-अक़्ल का तिरयाक
ये राज़ खुल ही गया हम पे बावले-पन में

ये जुगनुओं की चिताएँ ये सोगवार फ़ज़ा
सुलग उठे हैं शरारे नज़र के दामन में

सहर हुई तो बगूलों का रक़्स देखेंगे
ख़िज़ाँ ने हम को बुलाया है सेहन-ए-गुलशन में

मैं उस से भाग के जाऊँ भी तो कहाँ जाऊँ
छुपा हुआ है कोई रोज़-ओ-शब की चिलमन में

उठाऊँ तेशा-ए-फ़र्हाद बे-सुतूँ काटूँ
ये आरज़ू तो जवाँ थी मिरे लड़कपन में

मैं दिल की आग को ग़ज़लों का रूप देता हूँ
नहीं हरीफ़ किसी का मैं शे'र के फ़न में