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तलब से भी कुछ और ज़ियादा मिला | शाही शायरी
talab se bhi kuchh aur ziyaada mila

ग़ज़ल

तलब से भी कुछ और ज़ियादा मिला

मुनीर सैफ़ी

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तलब से भी कुछ और ज़ियादा मिला
बदन पर ग़मों का लबादा मिला

मुझे हर जगह सरफ़राज़ी मिली
कि ग़म का मुझे शाहज़ादा मिला

बहुत सादगी उस के बचपन में थी
जवानी का क़िस्सा भी सादा मिला

कि बे-साज़-ओ-सामान था इस लिए
मुझे हर सफ़र बे-इरादा मिला

ज़मीं पर तू सौ आसमाँ ओढ़ ले
मकाँ तुझ को कितना कुशादा मिला

रग-ए-संग जब भी निचोड़ी गई
गुलों का लहू ताज़ा ताज़ा मिला

हँसी को तरसते हुए लब मिले
हर इक शक्ल पर ग़म का ग़ाज़ा मिला