तलब से भी कुछ और ज़ियादा मिला
बदन पर ग़मों का लबादा मिला
मुझे हर जगह सरफ़राज़ी मिली
कि ग़म का मुझे शाहज़ादा मिला
बहुत सादगी उस के बचपन में थी
जवानी का क़िस्सा भी सादा मिला
कि बे-साज़-ओ-सामान था इस लिए
मुझे हर सफ़र बे-इरादा मिला
ज़मीं पर तू सौ आसमाँ ओढ़ ले
मकाँ तुझ को कितना कुशादा मिला
रग-ए-संग जब भी निचोड़ी गई
गुलों का लहू ताज़ा ताज़ा मिला
हँसी को तरसते हुए लब मिले
हर इक शक्ल पर ग़म का ग़ाज़ा मिला
ग़ज़ल
तलब से भी कुछ और ज़ियादा मिला
मुनीर सैफ़ी

