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तलाश-ए-रिज़्क़ में दीवान करता रहता हूँ | शाही शायरी
talash-e-rizq mein diwan karta rahta hun

ग़ज़ल

तलाश-ए-रिज़्क़ में दीवान करता रहता हूँ

असअ'द बदायुनी

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तलाश-ए-रिज़्क़ में दीवान करता रहता हूँ
अभी सफ़र नहीं सामान करता रहता हूँ

ख़ुद अपनी राह में अक्सर पहाड़ उगाता हूँ
ख़ुद अपनी मुश्किलें आसान करता रहता हूँ

सजाता रहता हूँ काग़ज़ के फूल शाख़ों पर
मैं तितलियों को परेशान करता रहता हूँ

मैं तुख़्म-ए-अश्क से तूफ़ाँ उगाने की ज़िद में
तमाम-शहर को हैरान करता रहता हूँ

मिरे मकाँ में धुआँ भी घुटन भी है लेकिन
मैं ख़ुशबुओं को भी मेहमान करता रहता हूँ