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तड़प भी है मिरी और बाइस-ए-सुकूँ भी है | शाही शायरी
taDap bhi hai meri aur bais-e-sukun bhi hai

ग़ज़ल

तड़प भी है मिरी और बाइस-ए-सुकूँ भी है

सय्यद काशिफ़ रज़ा

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तड़प भी है मिरी और बाइस-ए-सुकूँ भी है
तिरा बदन मिरा हासिल भी है, जुनूँ भी है

बदन पे दौड़ती आँखों की प्यास ग़ौर से पढ़
कि आँख ज़र्रा-ए-सहरा-ए-अंदरूँ भी है

क़ुबूल कर निगह-ए-पाएमाल ख़ुश-बदनी
मिरी अना का ये परचम है, और निगूँ भी है

मिरी निगाह भी बहकी हुई है कुछ, और कुछ
हया-ए-हुस्न रुख़-ए-यार पर फ़ुज़ूँ भी है

तुम्हारी दीद की भी है महक इन आँखों में
इसी नवाह में ख़ुश्बू-ए-जू-ए-ख़ूँ भी है