तब्लीग़-ए-पयाम हो गई है
हुज्जत भी तमाम हो गई है
जब मौज-ए-सबा उधर से आई
तफ़रीह-ए-मशाम हो गई है
कितनी बोदी है तब-ए-इंसाँ
आदत की ग़ुलाम हो गई है
ख़्वाहिश कि थी आदमी को लाज़िम
बढ़ कर इल्ज़ाम हो गई है
तम्हीद-ए-पयाम ही में अपनी
तक़रीर तमाम हो गई है
बचना कि वबा-ए-सोहबत-ए-बद
इस दौर में आम हो गई है
हल्क़े में क़लंदरों के आ कर
तहक़ीक़ तमाम हो गई है
जर्गा में लोक़ंदरों के जा कर
हिकमत बदनाम हो गई है
शीरीं-दहनों की तर्ज़-ए-गुफ़्तार
मक़्बूल-ए-अनाम हो गई है
बेजा भी निकल गई है जो बात
तहसीन-ए-कलाम हो गई है
नामर्द के हाथ में पहुँच कर
शमशीर नियाम हो गई है
तकफ़ीर-ए-बिरादरान-ए-दीं भी
शर्त-ए-इस्लाम हो गई है
क्या शेर कहें कि शाएरी की
तुर्की ही तमाम हो गई है
ग़ज़ल
तब्लीग़-ए-पयाम हो गई है
इस्माइल मेरठी

