तब्अ इशरत-पसंद रखता हूँ
इक दिल-ए-दर्दमंद रखता हूँ
बहुत कहता नहीं मैं पस्ती को
अपनी फ़ितरत बुलंद रखता हूँ
चश्म-ए-बातिन से देखता हूँ मैं
चश्म-ए-ज़ाहिर को बंद रखता हूँ
लफ़्ज़ शीरीं हैं और मअ'नी तल्ख़
ज़हर-आमेज़ क़ंद रखता हूँ
कामयाबी मुहाल है 'अख़्तर'
ज़ौक़ इतना बुलंद रखता हूँ
ग़ज़ल
तब्अ इशरत-पसंद रखता हूँ
अख़्तर अंसारी

