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तब्अ इशरत-पसंद रखता हूँ | शाही शायरी
taba ishrat-pasand rakhta hun

ग़ज़ल

तब्अ इशरत-पसंद रखता हूँ

अख़्तर अंसारी

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तब्अ इशरत-पसंद रखता हूँ
इक दिल-ए-दर्दमंद रखता हूँ

बहुत कहता नहीं मैं पस्ती को
अपनी फ़ितरत बुलंद रखता हूँ

चश्म-ए-बातिन से देखता हूँ मैं
चश्म-ए-ज़ाहिर को बंद रखता हूँ

लफ़्ज़ शीरीं हैं और मअ'नी तल्ख़
ज़हर-आमेज़ क़ंद रखता हूँ

कामयाबी मुहाल है 'अख़्तर'
ज़ौक़ इतना बुलंद रखता हूँ