तारीकियों में हम जो गिरफ़्तार हो गए
शायद सहर से पहले ही बेदार हो गए
ये कौन सा मक़ाम-ए-रह-ओ-रस्म है कि वो
इतने हुए क़रीब कि बेज़ार हो गए
मंज़िल की सम्त तुझ को न ले जाएँगे कभी
वो रास्ते जो आप ही हमवार हो गए
नाकामियों ने और भी सरकश बना दिया
इतने हुए ज़लील कि ख़ुद्दार हो गए
अब के तो नोक-ए-ख़ार भी गुल-रंग हो चली
कल देखना कि दश्त भी गुलज़ार हो गए
'नूरी' हमें जहाँ में मसर्रत की थी तलाश
आख़िर हर एक शख़्स के ग़म-ख़्वार हो गए
ग़ज़ल
तारीकियों में हम जो गिरफ़्तार हो गए
कर्रार नूरी

