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तारीकियों में हम जो गिरफ़्तार हो गए | शाही शायरी
tarikiyon mein hum jo giraftar ho gae

ग़ज़ल

तारीकियों में हम जो गिरफ़्तार हो गए

कर्रार नूरी

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तारीकियों में हम जो गिरफ़्तार हो गए
शायद सहर से पहले ही बेदार हो गए

ये कौन सा मक़ाम-ए-रह-ओ-रस्म है कि वो
इतने हुए क़रीब कि बेज़ार हो गए

मंज़िल की सम्त तुझ को न ले जाएँगे कभी
वो रास्ते जो आप ही हमवार हो गए

नाकामियों ने और भी सरकश बना दिया
इतने हुए ज़लील कि ख़ुद्दार हो गए

अब के तो नोक-ए-ख़ार भी गुल-रंग हो चली
कल देखना कि दश्त भी गुलज़ार हो गए

'नूरी' हमें जहाँ में मसर्रत की थी तलाश
आख़िर हर एक शख़्स के ग़म-ख़्वार हो गए