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तार-ए-निगाह-ए-लुत्फ़ से पहले रफ़ू करें | शाही शायरी
tar-e-nigah-e-lutf se pahle rafu karen

ग़ज़ल

तार-ए-निगाह-ए-लुत्फ़ से पहले रफ़ू करें

शोला करारवी

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तार-ए-निगाह-ए-लुत्फ़ से पहले रफ़ू करें
फिर मेरे ज़ख़्म-ए-दिल की दवा चारा-जू करें

कब तक तलाश-ए-यार में पानी लहू करें
मिलना है जब मुहाल तो क्या जुस्तुजू करें

फिर उन से अर्ज़-ए-हाल की कुछ आरज़ू करें
पहले दिल-ओ-जिगर को जब अपने लहू करें

जिस ने कभी किया न हो काबा की सम्त रुख़
मरने पे क्या ज़रूर उसे क़िबला-रू करें

पहले वो दिल में सोच लें अंजाम क्या हुआ
लुक्नत पे फिर कलीम की कुछ गुफ़्तुगू करें

ऐसे ही बे-ख़ुलूस के है दोस्ती हराम
जैसे कि हम नमाज़ अदा बे-वुज़ू करें

रिंदों के साथ पीना पिलाना है ना-गुज़ीर
फिर क्यूँ न हम भी बैअ'त-ए-दस्त-ए-सुबू करें

दोनों के दोनों ख़ंजर-ए-ग़म से हैं चाक चाक
दिल को रफ़ू करें कि जिगर को रफ़ू करें

'शो'ला' न फिर किसी से किसी को गिला रहे
हम एक दूसरे की अगर आबरू करें