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तमीज़-ए-पिसर-ए-ज़मीन व इब्न-ए-फ़लक न करना | शाही शायरी
tamiz-e-pisar-e-zamin wa ibn-e-falak na karna

ग़ज़ल

तमीज़-ए-पिसर-ए-ज़मीन व इब्न-ए-फ़लक न करना

आफ़ताब इक़बाल शमीम

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तमीज़-ए-पिसर-ए-ज़मीन व इब्न-ए-फ़लक न करना
तुम आदमी हो तो आदमी की हतक न करना

ये जम्अ'-ओ-तफ़रीक़ ज़र्ब-ओ-तक़सीम की सदी है
अक़ीदा ठहरा अदद की मंतिक़ पे शक न करना

पस-ए-ख़राबात-ए-बंद जारी है मय-गुसारी
सिखाया जाम-ओ-सुबू को हम ने खनक न करना

छलावे बन जाएँ आगे जा कर यही ग़ज़ालाँ
तआ'क़ुब इन मह-वशों का तुम दूर तक न करना

ये ग़म के मा'नी तुझे लगे है सराब-ए-मा'नी
अकेले सहना उसे ग़म-ए-मुश्तरक न करना