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तअल्लुक़ात तो मफ़्रूज़े ज़िंदगी के हैं | शाही शायरी
talluqat to mafruze zindagi ke hain

ग़ज़ल

तअल्लुक़ात तो मफ़्रूज़े ज़िंदगी के हैं

जमील मज़हरी

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तअल्लुक़ात तो मफ़्रूज़े ज़िंदगी के हैं
यहाँ न कोई है अपना न हम किसी के हैं

न इश्क़ ही के असर हैं न दुश्मनी के हैं
कि सारे ज़ख़्म मिरे दिल पे दोस्ती के हैं

चराग़ अगरचे नुमाइंदे रौशनी के हैं
मगर ये है कि ये आसार तीरगी के हैं

तुम्हारी तेज़-रवी देगी क्या सिवा-ए-ग़ुबार
कि नक़्श-ए-पा भी नतीजे सुबुक-रवी के हैं

शोकूक क्या हैं मिरे दोस्त आगही का बुलूग़
यक़ीन क्या है घरौंदे कुछ आगही के हैं

'जमील' अपना सुख़न इन पे राएगाँ न करो
ये मौलवी की सुनेंगे ये मौलवी के हैं