तअल्लुक़ात तो मफ़्रूज़े ज़िंदगी के हैं
यहाँ न कोई है अपना न हम किसी के हैं
न इश्क़ ही के असर हैं न दुश्मनी के हैं
कि सारे ज़ख़्म मिरे दिल पे दोस्ती के हैं
चराग़ अगरचे नुमाइंदे रौशनी के हैं
मगर ये है कि ये आसार तीरगी के हैं
तुम्हारी तेज़-रवी देगी क्या सिवा-ए-ग़ुबार
कि नक़्श-ए-पा भी नतीजे सुबुक-रवी के हैं
शोकूक क्या हैं मिरे दोस्त आगही का बुलूग़
यक़ीन क्या है घरौंदे कुछ आगही के हैं
'जमील' अपना सुख़न इन पे राएगाँ न करो
ये मौलवी की सुनेंगे ये मौलवी के हैं
ग़ज़ल
तअल्लुक़ात तो मफ़्रूज़े ज़िंदगी के हैं
जमील मज़हरी

