तअ'ल्लुक़ात के ज़ख़्मों का हूँ सताया हुआ
जो शाम आई मिरा साया भी पराया हुआ
मिटेगा ज़ेहन से कब तेरी याद का अफ़्सूँ
हज़ार सदियों से ये बोझ है उठाया हुआ
वो एक शख़्स अभी दिल में छुप के बैठा है
वो शख़्स जो कभी अपना कभी पराया हुआ
हर एक लम्हे की आहट पे दिल लरज़ता है
ज़माने भर को हो जैसे गले लगाया हुआ
नई रुतों की हुआ ने अजीब साज़िश की
कि मौज-ए-ख़ूँ में है हर बर्ग-ए-गुल नहाया हुआ
किसी के साँस की आवाज़ तक नहीं आती
सुकूत-ए-मर्ग ने पहरा है वो बिठाया हुआ
हर इक नज़र में कोई अजनबी सी आहट है
हर एक दिल में कोई ख़ौफ़ है समाया हुआ
वो तीरगी है कि आँखों में इक किरन भी नहीं
वो ख़ामुशी है कि लम्हों ने ज़हर खाया हुआ
मैं अपने वक़्त के ज़िंदाँ का एक क़ैदी हूँ
नज़र नज़र है फ़सीलों ने सर उठाया हुआ
गुरेज़-पा है वो उम्र-ए-अज़ीज़ की मानिंद
है एक उम्र से अपना जिसे बनाया हुआ
न कोई यार न हमदम न कोई हमराही
तुम्हारी ज़ुल्फ़ का साया तो ख़ैर साया हुआ
ग़ज़ल
तअ'ल्लुक़ात के ज़ख़्मों का हूँ सताया हुआ
जमील यूसुफ़

