EN اردو
ता-देर हम ब-दीदा-ए-तर देखते रहे | शाही शायरी
ta-der hum ba-dida-e-tar dekhte rahe

ग़ज़ल

ता-देर हम ब-दीदा-ए-तर देखते रहे

मोहसिन भोपाली

;

ता-देर हम ब-दीदा-ए-तर देखते रहे
यादें थीं जिस में दफ़्न वो घर देखते रहे

क्या क्या न ए'तिबार दिया इक सराब ने
हर-चंद तिश्ना-लब थे मगर देखते रहे

सूरज चढ़ा तो फिर भी वही लोग ज़द में थे
शब भर जो इंतिज़ार-ए-सहर देखते रहे

सेहन-ए-चमन को अपने लहू से सँवार कर
दस्त-ए-हवस में हम गुल-ए-तर देखते रहे

ये दिल ही जानता है कि किस हौसले के साथ
नाक़दरी-ए-मता-ए-हुनर देखते रहे

'मोहसिन' उरूज-ए-कम-नज़राँ सानेहा नहीं
ये सानेहा है अहल-ए-नज़र देखते रहे