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ता-ब-कै मंज़िल-ब-मंज़िल हम मुसाफ़िर भागते | शाही शायरी
ta-ba-kai manzil-ba-manzil hum musafir bhagte

ग़ज़ल

ता-ब-कै मंज़िल-ब-मंज़िल हम मुसाफ़िर भागते

रऊफ़ ख़ैर

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ता-ब-कै मंज़िल-ब-मंज़िल हम मुसाफ़िर भागते
आँख अब ठहरी हुई है और मनाज़िर भागते

ऐ हरीफ़-ए-हर-क़दम शह-मात से बचने की सोच
इस बिसात-ए-ख़ाक से क्या हम से शातिर भागते

हम तो आए हैं यहाँ मिटने मिटाने के लिए
इस ज़मीन-ए-कर्बला से किस की ख़ातिर भागते

बस में आ जाने का जज़्बा बस में करने की हवस
ख़ाक-ओ-बाद-ओ-आब-ओ-आतिश भी हैं क़ासिर भागते

सर कहीं पाँव कहीं आँखें कहीं चेहरा कहीं
इस हवस में खो गई पहचान आख़िर भागते

'ख़ैर' शब-ख़ूँ मार कर छुप जाने वाले हम नहीं
मा'रका सर करने निकले हैं तो क्या फिर भागते

खोद लेते हैं कुआँ शहदाब पा लेते हैं 'ख़ैर'
इस ज़मीन-ए-सख़्त से क्या हम से शाइ'र भागते